बच्चों के संस्कार
शास्त्र में सोलह संस्कार गिने गए हैं। इनमें से आठ बचपन में आते हैं — और हर एक में कोई एक बात कुंडली से देखी जाती है। यहाँ वही लिखा है: कौन संस्कार कब, उसमें होता क्या है, और ज्योतिष उसमें किस काम आता है।
नवजात के जन्म पर किया जाने वाला पहला संस्कार। शहद-घी से जिह्वा पर स्वस्तिक, और कान में पहला मंत्र।
ध्यान रहे: डॉक्टर एक साल से छोटे शिशु को शहद देने से साफ़ मना करते हैं (शिशु-बोटुलिज़्म का ख़तरा), और छह महीने तक सिर्फ़ माँ का दूध (या डॉक्टर कहें तो फ़ॉर्मूला) — न पानी, न घी, न घुट्टी। रीति प्रतीक रूप में निभाइए; शिशु के मुँह में कुछ न जाए। सबसे पहले माँ की छाती से लगाना और पहले घंटे में स्तनपान — पहला पीला दूध (खीस) ही शिशु का पहला आहार है, इसे फेंकिए मत। जन्म के टीके (बीसीजी, पोलियो, हेपेटाइटिस-बी) अस्पताल से निकलने से पहले लगते हैं।
बच्चे को नाम दिया जाता है। परिवार, पुरोहित और नाते-रिश्ते के सामने पहली बार नाम पुकारा जाता है।
ध्यान रहे: नवजात के लिए आयोजन छोटा रखिए: शिशु को गोद लेने से पहले सब हाथ धोएँ, चेहरे को चूमना नहीं, और जिसे सर्दी-खाँसी या होंठ पर छाले हों, वह दूर रहे।
शिशु पहली बार घर से बाहर, खुली हवा और सूरज-चाँद के सामने लाया जाता है।
ध्यान रहे: छाँव में छोटी-सी सैर: छह महीने से छोटे शिशु को सीधी धूप से बचाइए — हल्का कपड़ा और टोपी — और चेहरा कभी सूरज की ओर मत कीजिए।
पहली बार अन्न — खीर या चावल — बच्चे के मुँह में दिया जाता है।
ध्यान रहे: डॉक्टर छह पूरे महीने होने पर नरम ठोस आहार शुरू करने की सलाह देते हैं; संस्कार का मुहूर्त बाद में पड़े तो तब तक खाना रोककर मत रखिए — संस्कार उस दिन का उत्सव-भोज बन सकता है। एक चम्मच नरम, एकसार चीज़ — ऊपर से चीनी, नमक या शहद नहीं; साबुत मेवे या किशमिश नहीं; शिशु सीधा बैठा हो; और 'चुनने' की रस्म के सिक्के-गहने मुँह में न जाएँ।
कान छेदन — परंपरा के संस्कारों में से एक।
ध्यान रहे: किसी प्रशिक्षित व्यक्ति से, नई जीवाणु-रहित सुई (या एक बार इस्तेमाल होने वाली गन) से करवाइए, शुरुआती टीकों के बाद; सोने के छोटे स्टड, पेच वाले — बाली या लटकन नहीं; दिन में दो बार सफ़ाई; लाली, सूजन, मवाद या बुख़ार हो तो डॉक्टर को दिखाइए।
पहली बार सिर के बाल उतारे जाते हैं। कई परिवार इसे कुलदेवता के स्थान पर करते हैं।
ध्यान रहे: नया ब्लेड (या मशीन) ही इस्तेमाल हो — इस पर ज़ोर दीजिए; बच्चे को स्थिर पकड़िए; पहले साल सिर के नरम हिस्से (तालू) का ख़ास ध्यान; कोई खरोंच लगे तो साफ़ पानी से धोइए; मुंडे सिर को धूप से ढकिए।
अक्षर-आरंभ। बच्चे से पहली बार अक्षर लिखवाया जाता है — परंपरा में सरस्वती-वंदना के साथ।
जनेऊ संस्कार — औपचारिक शिक्षा के आरंभ का चिह्न। परंपरा और कुल के अनुसार आयु अलग-अलग मानी जाती है।
पूजा और उपाय
बच्चों के लिए शास्त्र रत्न नहीं कहता — आदत, दान और सादा पूजन कहता है। नीचे वही है, और हर एक के साथ यह भी कि उसे कुंडली से कैसे जोड़ा जाता है।
जन्मदिन और नक्षत्र-दिन
हर महीने जिस दिन चंद्रमा जन्म-नक्षत्र में लौटता है, उसे शास्त्र बच्चे का अपना दिन मानता है। उस दिन नक्षत्र-देवता का साधारण पूजन और बच्चे को पसंद का भोजन — परंपरा में इतना ही कहा गया है।
अश्विनी · मघा · मूल · अश्लेषा · ज्येष्ठा · रेवती
इन छह नक्षत्रों को गंडमूल कहा जाता है। परंपरा में जन्म से 27वें दिन, जब चंद्रमा उसी नक्षत्र में लौटता है, शांति-पूजन किया जाता है। यह डरने की बात नहीं — रीति है, और कुंडली में इससे कुछ बुरा नहीं जुड़ता।
ध्यान रहे: 27 दिन के शिशु को हवन के धुएँ और आग से दूर रखिए — शिशु की जगह माता-पिता बैठ सकते हैं।
किसी एक ग्रह की कमज़ोर स्थिति पर
कुंडली में जो ग्रह दबा हुआ बैठा हो, उसके लिए उसका दिन, उसका दान और उसका मंत्र — यही नवग्रह शांति का सार है। बच्चों के लिए रत्न नहीं, आदत और दान बताए जाते हैं।
विद्यारंभ और पढ़ाई
बुध-गुरु के दिन, बसंत पंचमी, या विद्यारंभ के मुहूर्त पर। बच्चे के हाथ से पहला अक्षर इसी दिन लिखवाने की परंपरा है।
बार-बार तबीयत ख़राब होने पर
कुंडली में जो अंग या तत्त्व कमज़ोर दिखे, उसी के अनुसार परंपरा में हनुमान या बटुक-भैरव का पूजन कहा गया है। बार-बार बीमारी का कारण बच्चों के डॉक्टर ही खोज सकते हैं — घर की या आयुर्वेदिक कोई भी दवा दी हो तो उन्हें बताइए, क्योंकि कुछ में सीसा होता है। पूजन उसके साथ है, उसकी जगह कभी नहीं — शास्त्र भी यही कहता है।
छोटे शिशु
घर की सबसे पुरानी रीत — काजल, राई-नमक, या कुलदेवता के आगे दीपक। जन्म-कुंडली में इसका कोई अलग दोष नहीं गिना जाता; यह घर की परंपरा है, और उतनी ही रहने दी जानी चाहिए।
ध्यान रहे: शिशु पर काजल या सुरमा बिलकुल मत लगाइए — न आँख में, न त्वचा पर: डॉक्टर मना करते हैं, क्योंकि कई में सीसा होता है जो हाथों से मुँह में जाता है, और आँख में संक्रमण भी हो सकता है। नज़र का निशान लगाना ही हो तो कान के पीछे सीसा-रहित किसी चीज़ का छोटा-सा टीका।
संस्कार और पूजा परंपरा हैं — और परंपरा की अपनी जगह है। लेकिन बच्चे की तबीयत, पढ़ाई और मन के लिए डॉक्टर, शिक्षक और आपका समय — इनकी जगह कोई पूजा नहीं ले सकती, और शास्त्र भी यही कहता है। यहाँ जो लिखा है, वह इनके साथ है, इनकी जगह नहीं।